Sunday, June 10, 2012

खद्दर के पैरहन में दौड़ बहुत है


खद्दर के पैरहन में दौड़ बहुत है;
इस नस्ल के टट्टुओं में होड़ बहुत है;
(पैरहन=कपड़े)

घुट-घुट के जी रहा हूँ इस बकरमंडी में;
दरवाज़ा बंद कर... उफ़.... शोर बहुत है;

वो भी ना आए... और अब दम भी नहीं बचा;
कहता है कौन इश्क में ज़ोर बहुत है...?

बावले हो जाओगे, सुनने की जिद्द को छोड़ो;
मेरी दास्तान-ए-इश्क में मोड़ बहुत है;

खुदा है वो या है भगवान्.... ये मलाल क्यूं है..?


खुदा है वो या है भगवान्.... ये मलाल क्यूं है..?
इक तर्जुमे को ले कर इतना बवाल क्यूं है..?

जो ग़र नहीं हो यकीं मुझपे... आज़मा मुझको ;
वो मुद्दतों से तेरे दिल में फिर सवाल क्यूं है ;

तुझे हो मुझसे हिकारत, ये हो नहीं सकता ;
भुला दिया है अगर मुझको तो ख़्याल क्यूं है ;
(हिकारत=नफरत)

कौन कहता है कि मुहब्बत एक बार होती है


कौन कहता है कि मुहब्बत एक बार होती है;
दिल में जज़्बा हो तो हज़ार बार होती है;

महज़बीं कोई इधर से गुज़र भर जाए;
इक ख़लिश सी मुझे बार-बार होती है;
(ख़लिश=चुभन)

नादां हो.... परहेज़ ना करो चिलमन से;
आशिकों की नज़र बड़ी खूंखार होती है;
(चिलमन=पर्दा)

छुप के करते हैं इश्क--आशिकी 'शाहिद';
ख़ुदा जाने ये कैसे इश्तेहार होती है;

इश्क मुझसे ना सही... पर नाम बताते जाओ


इश्क मुझसे ना सही... पर नाम बताते जाओ;
भले फ़रेब सही.... कोई ख्वाब दिखाते जाओ;
(फ़रेब=धोखा)

ज़हर, शराब, क़यामत, क़ज़ा.... क्या-क्या हो...!
अब गए हो तो होश भी उड़ाते जाओ;
(क़ज़ा=मृत्यु)

वली नहीं हूँ.... मगर मुहब्बत में दफ़्न हूँ तेरी;
उसूल--कब्र है.... इक शमा जलाते जाओ;
(वली=संरक्षक; उसूल--कब्र=कब्र का उसूल)

सबके किस्सों की तरह अपना किस्सा--ग़म है... मगर;
वाबस्ता तुमसे है तो दो अश्क बहाते जाओ;
(वाबस्ता=सम्बंधित)

बाज़ार--उल्फ़त में 'शाहिद' को बेंचने वालों;
कमा चुके हो मुनाफा तो दुकान बढ़ाते जाओ;
(बाज़ार--उल्फ़त=प्यार के बाज़ार)

दो चीज़ गुज़रती है मुफ़लिस पर मोटी

दो चीज़ गुज़रती है मुफ़लिस पर मोटी;
दो जून की गर्मी और दो जून की रोटी;

माँ-बाप की उमीदें, बच्चों की ज़िद भी तारी;
हैं पाँव मेरे लम्बे, चादर है बड़ी छोटी;

सरशारी--इशरत के गुज़रे थे दौर... पर अब;
जीने के वसीले हैं, हिम्मत ही नहीं होती;