खुदा... उनको भी तौफ़ीक-ए-मुहब्बत कर दे;
वो पहली बार ख़यानत में अमानत कर दे;
वो पहली बार ख़यानत में अमानत कर दे;
(तौफ़ीक-ए-मुहब्बत=प्यार प्रदान करना; ख़यानत=धोखा; अमानत=विश्वाश)
कभी तो महफ़िल-ए-नाशाद में शिरकत कर दे;
(ज़रुरत-ए-नूर=रौशनी की ज़रूरत; महफ़िल-ए-नाशाद=दुखी की महफ़िल)
बहुत संभल के हसीनों से बात करता हूँ;
ना जाने कब ज़रा सी बात पे आफत कर दें;
यहाँ जो लोग नमाज़ी बने से फिरते हैं;
गुल से इक भंवरा लिपट जाए.... तो क़यामत कर दें;
ज़रुरत-ए-नूर है.... मेरी दुनिया में अँधेरा है बहुत;
कभी तो महफ़िल-ए-नाशाद में शिरकत कर दे;
(ज़रुरत-ए-नूर=रौशनी की ज़रूरत; महफ़िल-ए-नाशाद=दुखी की महफ़िल)
बहुत संभल के हसीनों से बात करता हूँ;
ना जाने कब ज़रा सी बात पे आफत कर दें;
यहाँ जो लोग नमाज़ी बने से फिरते हैं;
गुल से इक भंवरा लिपट जाए.... तो क़यामत कर दें;
aapki duayen sach ho jaye
ReplyDeleteaameen