संग-ए-कूचा हूँ, रास्ते से हटा दे मुझको;
मैं मुश्त-ए-ख़ाक
हूँ, ठोकर से उड़ा दे मुझको;
(संग-ए-कूचा=गली का पत्थर || मुश्त-ए-ख़ाक=राख
का ढेर)
सिला-ए-इश्क ऐसा जो हिला दे मुझको;
काँप उठे
मेरे दुश्मन, वो सज़ा दे मुझको;
मगर तगाफ़ुल की कुछ
वजह दे मुझको;
(तगाफ़ुल=ignore)
तेरे
आँगन का दिया हूँ, तो यही अच्छा है;
अपने आँचल की हवा से बुझा दे मुझको;
कहेंगे लोग तो मुजरिम ख़ुलूस वालों को;
यकीं है... तू भी निगाहों से
गिरा दे मुझको;
(ख़ुलूस=प्यार)
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