इश्क मुझसे ना सही... पर नाम बताते जाओ;
भले फ़रेब सही.... कोई ख्वाब दिखाते जाओ;
ज़हर, शराब, क़यामत, क़ज़ा.... क्या-क्या हो...!
अब आ गए हो तो होश भी उड़ाते जाओ;
वली नहीं हूँ.... मगर मुहब्बत में दफ़्न हूँ तेरी;
उसूल-ए-कब्र है.... इक शमा जलाते जाओ;
(वली=संरक्षक; उसूल-ए-कब्र=कब्र का उसूल)
सबके किस्सों की तरह अपना किस्सा-ए-ग़म है... मगर;
वाबस्ता तुमसे है तो दो अश्क बहाते जाओ;
बाज़ार-ए-उल्फ़त में 'शाहिद' को बेंचने वालों;
कमा चुके हो मुनाफा तो दुकान बढ़ाते जाओ;
(बाज़ार-ए-उल्फ़त=प्यार के बाज़ार)
bhai apni book publish karwa lena
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